Wednesday, 16 December 2015

बोलिए

बंद करें इंटरनेट को, बहुत हुआ,
और पढ़ कर भी क्या करना?
ख़बरों में भी कितनी रूचि रखना?
सब फ़िज़ूल की चर्चा जो है
कुछ मन-गड़ित रचना भी है 
और फिर, मन को कितना दहलना 
रेप-ओ-फ़रेब का ज़माना जो है।   
और यह जान, जिस निहत्थे ने 
अपने विकलांग बच्चों के समक्ष, 
जो ना-पैदाइश, फ़रमाइश से हैं अपाहिज, 
अपनी जान खोयी थी, क्या बदला है?
आज भी उन्ही, बेनाम दलों की
आपसी मुठभेड़ की टीवी पर चर्चा है
कुछ मीडिया की टीआरपी से, 
कुछ आपके खून के उबाल से, 
संशोधित यह सारी समस्या है।
कानूनी इदारों का अस्तित्व अभी भी 
न्याय का मुखौटा बनाये रखना है। 
हर किसी के जानिब से सुनने में आया है
यही सब चलता था और चलते रहना है। 
जुर्म-ए-गुज़िश्ता का 
जन्म-जन्मान्तर दोहराया जाना है। 
अपनी बेवकूफ़ी का परिचय
हर शख़्सियत को हक़ से जताना है।

पर सच्च बताएं, कब तक यही चलते आना है?
जब सब सुर-संगीत बे-राग हो जाए?
दिलों की नज़ाकत मसल-कुचल दिया जाए?
नदियों-नहरों को अमिट सियाही पा जाए?
और नफ़रत-ओ-खून बस लाज़मी हो जाएँ?
बोलिए, कब तक यही सब सहना है?

कार्तिक अग्रवाल 

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