Wednesday, 10 October 2012

मैंने दिल से पूछा

मैंने दिल से पूछा ...

मैंने दिल से पूछा की क्या है ये तपन
क्या है ये खुमार के इंसान को चैन नहीं
क्या है ये बेताबी के मन को रुखसान नहीं
क्या ज़मीन है जो फिसल जाए पर धड़कन को लगाम नहीं
क्या मतलब है इन शौकों का की इंसान हैवान है कभी
कभी नीरस सी शांत तपन है चुभती
कभी क्रोध है उमड़ता के काबू नहीं
दूर दिन ढलते हैं, आँख नीर से नमी
अध् सोयी अध् रोयी अध् जीवन के संघर्षों से थकी
सपने हैं फूके तुझमे किसने ये बहार के ?
ग्हुलाब के खिलने के और मुरझाये बिन मिट जाने के
के देखें सराब तक जाते हैं नाजाने कितने साहिल-ऐ-ग्हुबार
मंज़िल की तालाश में, चैन-ए-अमन की आस में ...

पर पूछे हैं दिल से कोई?, दिल तू क्यों रोता है?
आख़िर ये दिल ही तो नीरस तन ढोता है
हर ग़मी का ग़म भी तो हमें तूने ही समझाया है
हर आशा में मग्न भी तो तू ने ही ठहराया है
ये बंदिशें भी तो तेरी ही हैं
ये तपिश की मांग भी तो तेरी ही है ...
तन नीरस तो क्या, तन दुख्लाता तो नहीं है!
ऐ मन मेरे, ये कैसे बंधन तू सिखलाता ही क्यों है।

कार्तिक अग्रवाल।

1 comment:

Wanderer said...

Interesting....liked the last para very much. Desires of the heart are not bad as long as they don't over power your emotions or take you on the wrong path. Desires are the root cause of all activities but must not become a distration from the right path.